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भावों में ग्रह · दुःस्थान

छठे भाव में केतु

South node · रिपु भाव

केतु वैराग्य, अंतर्ज्ञान, अध्यात्म और पूर्व कर्म का कारक है। छठे भाव, जिसे रिपु भाव कहते हैं, शत्रु, ऋण, स्वास्थ्य और सेवा को दर्शाता है। जब केतु यहाँ होता है, तो इन विषयों पर उसका रंग चढ़ता है।

छठे भाव में पाप ग्रह शुभ है: शत्रुओं को हराता है, ऋण चुकाता है और प्रतिस्पर्धा की शक्ति देता है।

छठे भाव दुःस्थान (कठिनाई का भाव) है, इसलिए यहाँ फल चुनौतियों से होकर आते हैं और सजगता चाहिए।

केतु छाया ग्रह है और राशि स्वामी व साथ बैठे ग्रहों के फल देता है; वृश्चिक में इसे बलवान माना जाता है।

यदि केतु वृषभ में नीच, अस्त या पाप ग्रहों से पीड़ित हो तो फल कमज़ोर होते हैं।

गोचर में

जब केतु आपकी चंद्र राशि से छठे भाव में गोचर करता है, तो पारंपरिक रूप से वह समय शुभ होता है।

कोई भी एक स्थिति अकेले नहीं पढ़ी जाती: राशि, दृष्टि, युति, दशा और पूरी कुंडली परिणाम बदलते हैं।

अपनी कुंडली में केतु किस भाव में है, उसके बल और स्थिति के साथ देखें।
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